Jab Se Tum Gaye Ho By Mansi Soni | The Social House Poetry | Whatashort - Flash Jokes - Latest shayari and funny jokes

Jab Se Tum Gaye Ho By Mansi Soni | The Social House Poetry | Whatashort

Jab Se Tum Gaye Ho By Mansi Soni | The Social House Poetry | Whatashort
Jab Se Tum Gaye Ho By Mansi Soni | The Social House Poetry | Whatashort

इस कविता के बारे में :

मानसी सोनी द्वारा लिखी गई यह खूबसूरत कविता 'जब से तुम हो गई', इस कविता को अनुभव का अनुभव कराती है, जब कोई किसी को छोड़ देता है और खुद को अकेला महसूस करता है जब वे निकल जाते हैं। ऐसे समय में जीवन, जीवन से भरा हुआ लगता है। यह कविता इस इरादे की मूल भावना को दर्शाती है, जिसे कवि मानसी सोनी ने 'द सोशल हाउस' लेबल के तहत प्रस्तुत किया है।

*****



जब से तुम गए हो ज़िंदा रहते हुए 

मुझे मौत का एहसास कुछ इस 

कदर हो रहा है

मनो मौत मेरे साथ बैठी एक ज़िन्दगी 

बिता रही हो

हमारे इश्क़ की दास्ताँ लिखी हो जिस पर 

में तो वो किताब बनना कहती थी

***

जब से तुम गए हो में फ़क़त उसका 

एक किस्सा बन के रह गयी हु

पूरी दुनिया साथ घूमने के ख़ुआब 

दिखायेते थे न तुमने

मगर जब से तुम गए हो ख़ुआब देखना 

तो दूर मुझे तो सोने से भी डर 

लगने लगा है

***

अब अपने पसंदीदा गानो की प्लेलिस्ट 

में किसी भी अजनबी के साथ 

शेयर कर लेती हु

मगर वो गाने जो तुमने और मैंने साथ 

बैठकर सुने थे उनकी जगह किसी 

प्लेलिस्ट में नहीं है

वो तो ता उम्र मेरे दिल और दिमाग में 

कैद होकर रहेंगे और जब भी 

में उन्हें सुनती हु

***

तो वो मुझे उस समय में ले जाते है 

जहा तुम्हारे और मेरे बीच ये और,

और ना ही कोई और था

तुम्हे याद है वो घड़ी जो तुमने 

मुझे तोफे में दी थी

उस घड़ी ने मुझे मेरी ज़िन्दगी के 

बहोत से हसीन पल

***

दिखाए है मगर जब से तुम गए हो वो 

घड़ी मुझे कुछ अजीब से वक़्त दिखने लगी है

मैंने खुद को पहचानना बंद कर दिया 

है जब से तुम गए हो

कियुँकि आईने में खड़ी वो लड़की जिसकी 

आँखों में तुम्हारा चेहरा नहीं दिखता

***

जिसके होठो पर एक नकली सी 

मुस्कुराहट रहती है

वो लड़की जो तुम्हे बेवफाई की बाज़ी 

जीताकर खुद ज़िन्दगी से हार गयी हो

वो लड़की में नहीं हो सकती वो कोई और है

तुम तो जानते ही थे मुझे अँधेरे से 

कितना खौफ आता था

***

मगर जब से तुम गए हो में अपने कमरे 

के किसी भी कोने में

रौशनी का आना पसंद नहीं करती 

मुझे डर रहता है की अगर

वो रौशनी तुम्हारी सिमटी हुई यादो पे 

जा गिरी तो में फिर से बिखर

***

जाउंगी मुझे वो सब याद आने लगेगा 

से में भुलाने की कोशिश में हु

ज़िंदगी से तो और भी रंजिशे रहने लगी है 

मुझे जब से तुम गए हो

मगर मेरी ये रंजिशे मेरे ग़म, मेरी बेज़ारी,

में किसी के सामने ज़ाहिर

नहीं करती बस अब लिख लेती हु

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सुनिए इस कविता का ऑडियो वर्शन




( Use UC Browser For Better Audio Experience )

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... Thank You ...



( Disclaimer: The Orignal Copyright Of this Content Is Belong to the Respective Writer )
                                                                                                                                                                                                                                                                                                  

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