Main Aaj Bhi Tumhare Baare Mein Likh Raha Hu | Yahya Bootwala - Flash Jokes - Latest shayari and funny jokes

Main Aaj Bhi Tumhare Baare Mein Likh Raha Hu | Yahya Bootwala

Main Aaj Bhi Tumhare Baare Mein Likh Raha Hu | Yahya Bootwala
Main Aaj Bhi Tumhare Baare Mein Likh Raha Hu | Yahya Bootwala

इस कविता के बारे में :

इस काव्य 'मैं आज भी तुम्हारे बारे मे लिख रहा हूँ' को Yahya Bootwala के लेबल के तहत Yahya Bootwala ने लिखा और प्रस्तुत किया है।

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मैं आज भी तुम्हारे बारे मे लिख रहा हूँ

तुम्हारा चेहरा किसी ग़ज़ल सा हैं

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जब तुम पलके ऊँची करती हो

तो वो किसी मुकम्मल शेर से लगते हैं

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और होंठ बखते की तरह

जिस पर हक सिर्फ शायर का है

मैं वही शायर बनना चाहता हूं

***

पर मै तुम्हारी तारीफ में इससे 

ज्यादा लिख नहीं पाता

कि झरने भी प्यासे हो जाते हैं 

जब तुम अपनी भीगी जुल्फें झटकती हो

***

तुम्हारी नाक की बनावट पर भगवानों 

मे आज भी मिशाल कामयाब है

बहक जाती है वो हवा भी जो तुम्हारी 

उँगलियों के बीच से होकर गुजर जाती है

***

मेरे दिल की धड़कन की कोई 

आवाज होती तो बिल्कुल

तुम्हारे झूमके की खनक की तरह सुनायी देती

और तुम्हारी आखें, तुम्हारी आखों 

मे ब्रह्माण्ड बसा हुआ है इसका 

छोटा हिस्सा बनना चाहता हू

***

इक सितारा ही सही जिसकी रोशनी 

उसके जाने के बाद तुम्हारे जहनियत मे रहे

मुझे तारीखें याद नहीं रहती पर 

तुम्हारी सारी हरकते याद है

***

जेसे जब तुम सज सब्रकर आईने के 

सामने खड़ी हो जाती हो खुद को 

देखने के बहाने मेरी तरफ देखा करती थी

एक तारीफ की उम्मीद मे 

जो मे नहीं करता था

***

फिर तुम पलटकर मुझसे कहती की 

कैसी दिख रही हू मैं तो मैं कहता बहुत सुन्दर

तो तुम बिना पूछे नहीं बता सकते थे

क्यू बताता सुन्दर तो तुम्हें सब कह देते

पर जिस भोलेपन से तुम वो सवाल पूछती हो

***

वो हर किसी के नसीब मे नही आता

जब तुम नाराज होकर किसी कोने 

मे बैठ जाया करती थी तो मैं जान पूछकर 

बेवकूफ़ी वाली हरकते करता था

***

जिसकी वजह से तुम्हारे चहरे 

पर एक आधे चांद वाली

मुस्कान आ जाया करती थी और 

मेरे दिल मे ईद बन जाती थी

तुम हर चीज़ सम्भाल कर रखती थीं

***

वो मूवी की टिकटें जो हमने साथ देखी थी

और फिर वो तोहफे जो मेने दिए थे

और शायद मेरी एक दो कमीज भी रख देते

अगर डब्बा बड़ा होता

***

और मैं कुछ सम्भाल कर नहीं रख पाया

ना चीजों को और ना तुम्हें

पर मेने तुम्हें अपने आप मे समेट कर रखा है

अपने मन मुताबिक तुम्हारे साथ जी लेता हू

तुम्हारे बचपने में आज भी हस देता हू

***

तुम्हरी कहानियो को उतने ही प्यार से सुनता हू

तुम्हारे कुछ फेसले जिनसे आज 

भी तुमसे नाराज बैठा हू

और कभी कभी तुम्हारी गोद मे सो लेता हू

***

इसी बहाने नींद आ जाती है

मैं आज भी सोचता हू काश मैं 

हमारी लकीरों को बाँध पाता तो 

हम उसकी गाँठ पर अपना घर बना लेते

***

पर जब हमने कोशिश की तो 

एक इंच के फासला रह गया

जो हमारी गलतफहमी और ग़लत 

फेसलो का था उस फासले को 

भरने मे एक जिंदगी निकल जायेगी

***

खैर

मैं आज भी तुम्हारे बारे मे लिख रहा हूँ


*****


... Thank You ...



( Disclaimer: The Orignal Copyright Of this Content Is Belong to the Respective Writer )
                                                                                                                                                                                                              

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