Tere Intezaar Mein | Ravie Solanky | The Social House Poetry - Flash Jokes - Latest shayari and funny jokes

Tere Intezaar Mein | Ravie Solanky | The Social House Poetry

Tere Intezaar Mein | तेरे इंतज़ार में | Ravie Solanky | The Social House Poetry | Whatashort
Tere Intezaar Mein | Ravie Solanky | The Social House Poetry

इस कविता के बारे में :

इस काव्य 'तेरे इंतज़ार में' को Social House के लेबल के तहत रवी सोलंकी ने लिखा और प्रस्तुत किया है।


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एक इंतज़ार की आदत सी होने लगी है

हमे तन्हाई से मोहब्बत होने लगी है

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चुप रहे ये लब अब यही मुनासिब है

खामोशियाँ अपना जादू करने लगी है

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ना शिकवा न गिला न शिकायत है किसी से

हमे अपने ही इश्क़ से गलतफैमियाँ होने लगी है

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बनाने लगे थे जिस रेत से महल अपना

अब वही रेत हाथ से बिखरने लगी है

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न काबिल हु में अब बैत-ए-इश्क़ सजाने में

ये ग़ैर मश्रूत इश्क़ की सज़ा लगने लगी है

ये ग़ैर मश्रूत इश्क़ की सज़ा लगने लगी है

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... Thank You ...



( Disclaimer: The Orignal Copyright Of this Content Is Belong to the Respective Writer )
                                                                                                                                                                                                                                                                                                  

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