Mai Doob Raha Hoon Apne Hi Bhavar Mein | Best Poetry of Zakir Khan - Flash Jokes - Latest shayari and funny jokes

Mai Doob Raha Hoon Apne Hi Bhavar Mein | Best Poetry of Zakir Khan

Mai Doob Raha Hoon Apne Hi Bhavar Mein | Best Poetry of Zakir Khan
Mai Doob Raha Hoon Apne Hi Bhavar Mein | Best Poetry of Zakir Khan




*****

मैं डूब रहा हूँ, 

अपने ही भवर में

रोज़ डूब रहा हूँ

मेरे अंतरमन में हज़ारों 

सुनामिया आती है 

***

मेरी आत्मा को अपने गहरे 

अंधेरों में खींचती है 

बहुत डरावनी जगह है वह, 

तुम कभी मत आना वहां 

जहाँ मैं… रोज़ डूबता हूँ   


***


डूबता हूँ, उभरता हूँ, 

लड़ता हूँ खुद ही से और

फिर उठकर आ जाता हूँ 

अपना तमाशा लेकर

तुमसे हाथ नहीं माँगा 


***


क्यूंकि भवर बहुत तेज़ है

बहुत तेज़ है यह मेरे विचलित 

मन का भवर 

मैं तोह डूब ही रहा हूँ 

तुम्हे साथ लेकर नहीं डूबना चाहता 

नहीं चाहता की इस सुनामी 

का एक चिट्टा भी 


***


कसी मेरे अपने पर पढ़े 

जैसे मैं खो रहा हूँ खुद को 

वैसे मैं तुम्हे नहीं खोना चाहता

मेरे अंतद्वंद की सबसे अच्छी बात यह 

की इस में हर रोज़ मैं ही जीतता हूँ 

और सबसे भयावर बात यह की


***


मैं ही हूँ जो हर रोज़ अपने 

ही आप से हार रहा हूँ 

रोज़ हार रहा हूँ, लगातार हार रहा हूँ 

न जीत का कोई तमगा मिलता है 


***


न हार के घाव देखते है

बस सब कुछ खली रहता है 

हाँ यह मैं कह रहा हूँ ठीक सुना तुमने 

की मैं डूब रहा हूँ, रोज़ डूब रहा हूँ 

अपने ही भवर में


***


पर 

मैं लड़ा हूँ, लडूगा

आज डूबा हूँ, पर उभरूंगा 

और कल…

फिर उठकर आ जाउगा 

अपना तमाशा ले कर


*****

... Thank You ...



Disclaimer: The Orignal Copyright Of this Content Is Belong to the Respective Writer )
                                                                                                                                                                                                              

Post a Comment

0 Comments