Phir Kab Aaogey - Sainee Raj Poetry - Flash Jokes - Latest shayari and funny jokes

Phir Kab Aaogey - Sainee Raj Poetry

Phir Kab Aaogey - Sainee Raj Poetry
Phir Kab Aaogey - Sainee Raj Poetry


इस कविता के बारे में :

इस प्रेम काव्य 'फिर कब आओगे' को स्पिल पोएट्री के लेबल के तहत सैनी राज ने लिखा और प्रस्तुत किया है।  

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सर्द गर्म गिला मौसम का रुख बदला

बिखरे वादों को मैंने कस कर पकड़ा

दर्द ने माझी से यादे उधर मंगवाई

नीले आसमान में चाँद ने 

अपनी शकल दिखाई

पर तुम न आये ...

***

साल सदियों से लम्बे लगे

आंखे जाली इंतज़ार करते - करते

झुर्रियों ने होटो के करीब अंगड़ाई ली

हाथो की रेखाओ ने भी 

अपना रास्ता बदला

पर तुम न आये...

***

मकान की दीवारों पे पपड़ी ने नक़्शे बनाये

मनो जैसे मेरे कई राज़्ज़ उनमे दफन हो

जालो से पंखो का वज़न कुछ और बड़ा

हवा भी कई दफे खिड़की 

खोल के आगई

पर तुम न आये...

***

फिर वक़्त ने ऐसा खेल खेला

दर्द भी दुख - दुख के थक गया

गिर कर संभलना हमने भी सिख लिया

और एक दिन अचानक

तुम आगये ...

***

बिरहा की रातो देखा

मेज़ पर पड़े बक्से में से सोलह

सृंगारो ने आवाज़ लगाई

दिल हलक तक की सेर पर निकल पड़ा हो

इस मर्तबा जाने क्या तबाही मचाओगे 

अब अहिगए हो तो घर के अंदर नहीं आओगे

***

सूजी आँखों से तुम्हारा किया

तुम एक बार प्यार से देख लो

ये इल्तेज़ा किया हर्फो ने लफ्ज़ो

का साथ यू छोड़ा की वो

जुमले मैंने तैयार किये थे

***

की एक दिन तुम पर बरसाउँगी

तुम सुनोगे में सुनाऊँगी

लड़ूंगी तुम्हे और नोच खाउंगी

और फिर थक कर हार जाउंगी

फर तुम्हे अश्को से अपने किस्से सुनाऊँगी

***

वो जुमले ज़बान पर ही चिपक गज्ञे

अब तुम सामने हो अलफ़ाज़ मुझसे बहुत दूर

आँखों में नमी है आग दोनों तरफ लगी है

में अब भी नाराज़ी का दामन थामे बैठी हु

तुमने अब तक जूते नहीं उतरे

इस बार तो रुक कर जाओगे

बातो फिर कब आओगे...


*****





... Thank You ...






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