Famous Gulzar Poetry In Hindi | Latest Gulzar Shayari In Hindi - Flash Jokes - Latest shayari and funny jokes

Famous Gulzar Poetry In Hindi | Latest Gulzar Shayari In Hindi

ज़िंदगी गुलज़ार हैं...




Famous Gulzar Poetry In Hindi | Latest Gulzar Shayari In Hindi
Famous Gulzar Poetry In Hindi | Latest Gulzar Shayari In Hindi

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गुलज़ार सहाब के बारे में ...

ग़ुलज़ार नाम से प्रसिद्ध सम्पूर्ण सिंह कालरा (जन्म -18 अगस्त 1934) गुलज़ार का जन्म भारत के झेलम जिला पंजाब के दीना गाँव में, जो अब पाकिस्तान में है हिन्दी फिल्मों के एक प्रसिद्ध गीतकार हैं। इसके अतिरिक्त वे एक कवि, पटकथा लेखक, फ़िल्म निर्देशक तथा नाटककार हैं।

उनकी रचनाए मुख्यतः हिन्दी, उर्दू तथा पंजाबी में हैं, परन्तु ब्रज भाषा, खङी बोली, मारवाड़ी और हरियाणवी में भी इन्होने रचनाये की। गुलजार को वर्ष 2002 में सहित्य अकादमी पुरस्कार और वर्ष 2008 में भारत सरकार द्वारा दिया जाने वाला तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म भूषण से भी सम्मानित किया जा चुका है।

वर्ष 2009 में डैनी बॉयल निर्देशित फिल्म स्लम्डाग मिलियनेयर में उनके द्वारा लिखे गीत जय हो के लिये उन्हे सर्वश्रेष्ठ गीत का ऑस्कर पुरस्कार मिल चुका है। इसी गीत के लिये उन्हे ग्रैमी पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है।



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ज़िंदगी गुलज़ार हैं




आइना देख कर तसल्ली हुई

हम को इस घर में जनता है कोई







शाम से आँख में नमी सी है

आज फिर आप की कमी सी है







ज़िन्दगी यूं हुई बसर तनहा

क़ाफ़िला साथ और सफर तनहा




Gulzar Shayari In Hindi


कभी तो चौंक के देखे कोई हमारी तरफ

किसी की आँख में हम को भी इन्तिज़ार दिखे







वक़्त रहता नहीं कहीं टिक कर

आदत इस की भी आदमी सी है







आदतन तुम ने कर दिए वादे

आदतन हम ने एतिबार किया







हाथ छूटें भी तो रिश्ते नहीं छोड़ा करते

वक़्त की शाख से लम्हे नहीं तोडा करते







हम ने अक्सर तुम्हारी राहों में

रुक कर अपना ही इन्तिज़ार किया







मैं चुप करता हूँ हर शब् उमड़ती बारिश को

मगर ये रोज़ गई बात छेड़ देती है







अपने साए से चौंक जाते हैं

उम्र गुज़री है इस क़दर तनहा







जिस की आँखों में कटी थीं साड़ियां

उस ने सदियों की जुदाई दी है







कोई खामोश ज़ख़्म लगती है

ज़िन्दगी एक नज़्म लगती है







आप के बाद हर घडी हम ने

आप के साथ ही गुज़री है







कितनी लम्बी ख़ामोशी से गुज़रा हूँ

उन से कितना कुछ कहने की कोशिश की







खुशबु जैसे लोग मिले अफ़साने में

एक पुराण खत खोला अनजाने में




Gulzar Shayari In Hindi


कल का हर वाक़िअ तुम्हारा था

आज की दास्ताँ हमारी है







दिल पर दस्तक देने कौन आ निकला है

किस की आहात सुनता हूँ वीराने में







देर से गूंजते हैं सन्नाटे

जैसे हम को पुकारता है कोई







एक ही ख्वाब ने सारी रात जगाया है

मैं ने हर करवा सोने की कोशिश की







उसी का इमां बदल गया है

कभी जो मेरा खुदा रहा था







सहमा सहमा डरा सा रहता है

जाने क्यूँ जी भरा सा रहता है




गुलज़ार की नज़्में...



आओ तुमको उठा लूँ कंधों पर

तुम उचककर शरीर होठों से चूम लेना

चूम लेना ये चाँद का माथा

आज की रात देखा ना तुमने

कैसे झुक-झुक के कोहनियों के बल

चाँद इतना करीब आया है







इक सन्नाटा भरा हुआ था,

एक गुब्बारे से कमरे में,

तेरे फोन की घंटी के बजने से पहले.

बासी सा माहौल ये सारा

थोड़ी देर को धड़का था

साँस हिली थी, नब्ज़ चली थी,

मायूसी की झिल्ली आँखों से उतरी कुछ लम्हों को

फिर तेरी आवाज़ को, 

आखरी बार "खुदा हाफिज़"

कह के जाते देखा था!

इक सन्नाटा भरा हुआ है,

जिस्म के इस गुब्बारे में,

तेरी आखरी फोन के बाद








कांच के पार टायर हाथ नज़र आते हैं

काश खुशबु की तरह रंग हिना का होता




Gulzar Shayari In Hindi


तुम्हारे ख्वाब से हर शब् लिपट के सोते हैं

सज़ाएं भेज दो हम ने खटाएं भेजी हैं







जब भी ये दिल उदास होता है

जाने कौन आस-पास होता है







आप ने औरों से कहा सब कुछ

हम से भी कुछ कभी कहीं कहते







फिर वहीँ लौट के जाना होगा

यार ने कैसी रिहाई दी है







राख को भी कुरेद कर देखो

अभी जलता हो कोई पल शायद







आँखों के पोछने से लगा आग का पता

यूं चेहरा फेर लेने से छुपता नहीं धुआं







ज़ख्म कहते हैं दिल का गहना है

दर्द दिल का लिबास होता है







वो उम्र कम कर रहा था मेरी

मैं साल अपने बढ़ा रहा था




Gulzar Poetry In Hindi



वो एक दिन एक अजनबी को

मिरी कहानी सुना रहा था







दिन कुछ ऐसे गुज़रता है कोई

जैसे एहसान उतरता है कोई







ज़िन्दगी पर भी कोई ज़ोर नहीं

दिल ने हर चीज़ पराई दी है







यादों की बौछारों से जब पलकें भीगने लगती हैं

सोंधी सोंधी लगती है तब माज़ी की रुसवाई भी







ख़ामोशी का हासिल भी इक लम्बी सी ख़ामोशी थी

उन की बात सुनी भी हम ने अपनी बात सुनाई भी




Gulzar Poetry In Hindi



रुके रुके से क़दम रुक के बार बार चले

क़रार दे के टायर दर से बे-क़रार चले







जो बरसती नहीं सदा ऑंखें

अब्र तो बारे मॉस होता है







एक सन्नाटा दबे-पांव गया हो जैसे

दिल से इक खौफ सा गुज़रा है बिछड़ जाने का







चाँद उम्मीदें निचोड़ी थीं तो आहें टपकीं

दिल को पिघलाएं तो हो सकता है सांसें निकलें







ये दिल भी दोस्त ज़मीं की तरह

हो जाता है दांव-दोल कभी







ये शुक्र है की मीरे पास तेरा ग़म तो रहा

वगरना ज़िन्दगी भर को रुला दिया होता







चूल्हे नहीं जलाए की बस्ती ही जल गई

कुछ रोज़ हो गए हैं अब उठता नहीं धुआं







भरे हैं रात के रेज़े कुछ ऐसे आँखों में

उजाला हो तो हम ऑंखें झपकते रहते हैं







ये रोटियां हैं ये सिक्के हैं और दायरे हैं

ये एक दूजे को दिन भर पकड़ते रहते हैं




Gulzar Poetry In Hindi



आँखों से आंसुओं के मरासिम पुराने हैं

मेहमान ये घर में आएं तो चुभता नहीं धुआं







रात गुज़रते शायद थोड़ा वक़्त लगे

धूप उँड़ेलो थोड़ी सी पैमाने में







यूं भी इक बार तो होता की समुन्दर बहता

कोई एहसास तो दरिया की आना का होता







अपने माज़ी की जुस्तुजू में बहार

पीले पत्ते तलाश करती है







आग में क्या क्या जला है शब् भर

कितनी खुश-रंग दिखाई दी है







मैं अगर छोड़ न देता, तो मुझे छोड़ दिया होता, उसने

इश्क़ में लाज़मी है, हिज्रो- विसाल मगर

इक अना भी तो है, चुभ जाती है पहलू बदलने में कभी

रात भर पीठ लगाकर भी तो सोया नहीं जाता




गुलज़ार की नज़्में...



बुरा लगा तो होगा ऐ खुदा तुझे,

दुआ में जब,

जम्हाई ले रहा था मैं--

दुआ के इस अमल से थक गया हूँ मैं !

मैं जब से देख सुन रहा हूँ,

तब से याद है मुझे,

खुदा जला बुझा रहा है रात दिन,

खुदा के हाथ में है सब बुरा भला--

दुआ करो !

अजीब सा अमल है ये

ये एक फ़र्जी गुफ़्तगू,

और एकतरफ़ा--एक ऐसे शख्स से,

ख़याल जिसकी शक्ल है

ख़याल ही सबूत है.







मैं शब को कैसे बतलाऊँ,

बहुत से दिन मेरे आँगन में यूँ आधे अधूरे से

कफ़न ओढ़े पड़े हैं कितने सालों से,

जिन्हें मैं आज तक दफना नही पाया!!







वह आई है कि मेरे घर में उसको दफ्न कर के,

इक दीया दहलीज़ पे रख कर,

निशानी छोड़ दे कि मह्व है ये कब्र,

इसमें दूसरा आकर नहीं लेटे!







मेरी दहलीज़ पर बैठी हुयी जानो पे सर रखे

ये शब अफ़सोस करने आई है कि मेरे घर पे

आज ही जो मर गया है दिन

वह दिन हमजाद था उसका!




Gulzar Poetry In Hindi



आओ फिर नज़्म कहें

फिर किसी दर्द को सहलाकर सुजा ले आँखें

फिर किसी दुखती हुई रग में छुपा दें नश्तर

या किसी भूली हुई राह पे मुड़कर एक बार

नाम लेकर किसी हमनाम को आवाज़ ही दें लें

फिर कोई नज़्म कहें








देखो आहिस्ता चलो,और भी आहिस्ता ज़रा

देखना,सोच-समझकर ज़रा पाँव रखना

जोर से बज न उठे पैरों की आवाज़ कहीं

कांच के ख़्वाब हैं बिखरे हुए तन्हाई में

ख़्वाब टूटे न कोई, जाग न जायें देखो

जाग जायेगा कोई ख़्वाब तो मर जायेगा





गुलज़ार की नज़्में...




खाली डिब्बा है फ़क़त, खोला हुआ चीरा हुआ

यूँ ही दीवारों से भिड़ता हुआ, टकराता हुआ

बेवजह सड़कों पे बिखरा हुआ, फैलाया हुआ

ठोकरें खाता हुआ खाली लुढ़कता डिब्बा

यूँ भी होता है कोई खाली-सा- बेकार-सा दिन


ऐसा बेरंग-सा बेमानी-सा बेनाम-सा दिन







कंधे झुक जाते है जब बोझ से इस लम्बे सफ़र के

हांफ जाता हूँ मैं जब चढ़ते हुए तेज चढाने

सांसे रह जाती है जब सीने में एक गुच्छा हो कर

और लगता है दम टूट जायेगा यहीं पर

एक नन्ही सी नज़्म मेरे सामने आ कर

मुझ से कहती है मेरा हाथ पकड़ कर-मेरे शायर

ला , मेरे कन्धों पे रख दे,

में तेरा बोझ उठा लूं








दिल में ऐसे ठहर गए हैं ग़म

जैसे जंगल में शाम के साये

जाते-जाते सहम के रुक जाएँ

मुडके देखे उदास राहों पर

कैसे बुझते हुए उजालों में

दूर तक धूल ही धूल उड़ती है








आज फिर चाँद की पेशानी से उठता है धुआँ

आज फिर महकी हुई रात में जलना होगा

आज फिर सीने में उलझी हुई वज़नी साँसें

फट के बस टूट ही जाएँगी, बिखर जाएँगी

आज फिर जागते गुज़रेगी तेरे ख्वाब में रात

आज फिर चाँद की पेशानी से उठता धुआँ







कैसी ये मोहर लगा दी तूने...

शीशे के पार से चिपका तेरा चेहरा

मैंने चूमा तो मेरे चेहरे पे छाप उतर आयी है उसकी,

जैसे कि मोहर लगा दी तूने...

तेरा चेहरा ही लिये घूमता हूँ, शहर में तबसे

लोग मेरा नहीं, एहवाल तेरा पूछते हैं, मुझ से !!




Gulzar Poetry In Hindi



बीच आस्मां में था

बात करते- करते ही

चांद इस तरह बुझा

जैसे फूंक से दिया

देखो तुम…

इतनी लम्बी सांस मत लिया करो







थोड़ी देर ज़रा-सा और वहीं रुकतीं तो...

सूरज झांक के देख रहा था खिड़की से

एक किरण झुमके पर आकर बैठी थी,

और रुख़सार को चूमने वाली थी कि

तुम मुंह मोड़कर चल दीं और बेचारी किरण

फ़र्श पर गिरके चूर हुईं

थोड़ी देर, ज़रा सा और वहीं रूकतीं तो...







शहतूत की शाख़ पे बैठा कोई

बुनता है रेशम के धागे

लम्हा-लम्हा खोल रहा है

पत्ता-पत्ता बीन रहा है

एक-एक सांस बजा कर सुनता है सौदाई

एक-एक सांस को खोल के अपने 

तन पर लिपटाता जाता है

अपनी ही साँसों का क़ैदी

रेशम का यह शायर इक दिन

अपने ही तागों में घुट कर मर जाएगा





Gulzar Poetry In Hindi



मुझसे इक नज़्म का वादा है,

मिलेगी मुझको

डूबती नब्ज़ों में,

जब दर्द को नींद आने लगे

ज़र्द सा चेहरा लिए चाँद,

उफ़क़ पर पहुंचे

दिन अभी पानी में हो,

रात किनारे के क़रीब

न अँधेरा, न उजाला हो,

यह न रात, न दिन

ज़िस्म जब ख़त्म हो

और रूह को जब सांस आए

मुझसे इक नज़्म का वादा है मिलेगी मुझको







देखो, आहिस्ता चलो और भी आहिस्ता ज़रा

देखना, सोच सँभल कर ज़रा पाँव रखना

ज़ोर से बज न उठे पैरों की आवाज़ कहीं

कांच के ख़्वाब हैं बिखरे हुए तन्हाई में

ख़्वाब टूटे न कोई जाग न जाए देखो

जाग जाएगा कोई ख़्वाब तो मर जाएगा








चार तिनके उठा के जंगल से

एक बाली अनाज की लेकर

चंद कतरे बिलखते अश्कों के

चंद फांके बुझे हुए लब पर

मुट्ठी भर अपने कब्र की मिटटी

मुट्ठी भर आरजुओं का गारा

एक तामीर की लिए हसरत

तेरा खानाबदोश बेचारा

शहर में दर-ब-दर भटकता है

तेरा कांधा मिले तो टेकूं!





Gulzar Poetry In Hindi



आदमी बुलबुला है पानी का

और पानी की बहती सतह पर टूटता भी है, 

डूबता भी है,

फिर उभरता है, फिर से बहता है,

न समंदर निगला सका इसको, 

न तवारीख़ तोड़ पाई है,

वक्त की मौज पर सदा बहता 

आदमी बुलबुला है पानी का।






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... Thank You ...
                                                                                                                                                                                                                                                                      

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