Sahi Aur Galat | Sainee Raj Poetry | UnErase Poetry - Flash Jokes - Latest shayari and funny jokes

Sahi Aur Galat | Sainee Raj Poetry | UnErase Poetry

सही और ग़लत का फ़ैसला आख़िर कौन करता हैं



"Sahi Aur Galat" - Sainee Raj | UnErase Poetry
"Sahi Aur Galat" - Sainee Raj



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मेरी कमीज का रंग किसी के लिए सही होगा


तो किसी के लिए मेरा पहनावा ग़लत

किसी के लिए मेरी चमड़ी स्वाली होगीं

तो किसी के लिए मेरा मुह काला होगा


...

यह सही और गलत के बीच मे क्य़ा हैं

जो न ही सही और न ही ग़लत

ओर सहीं हैं तो क्यूँ नहीं हैं

और ग़लत हैं तो सही क्यूँ लगता हैं

यह सही और ग़लत का फ़ैसला आखिर कौन करता हैं

...

किसी को ख़यालों में बसाना सहीं हैं क्य़ा

अगर बाहों में और कोई हों

और जो बाहों में हैं वो सही नहीं 

तो जो ख़यालों मे हैं वो ग़लत कैसे

अगर आपका दिल किसी को बार बार पुकारें 

जिसे पुकारना नापाक हैं

...

तो यह ग़लत होगा कि वो सामने आ जाए 

तो उसे अनदेखा करना न गवारा हो

और अगर वो सामने हैं 

तो क्यूँ उसे पलभर के लिए देखना भी सही नहीं है

और ग़लत हैं तो सही क्या हैं

यह सही और ग़लत का फ़ैसला आख़िर कौन करता हैं

...

अगर चोरी करने की सज़ा मिलतीं हैं 

तो दिल दुखाने कीं भी सज़ा मिलनी चाहिए

अगर अदालतों में घर तोड़ने की सुनवाई की जाती हैं 

तो घर तबाह करने की भी सजा मिलनी चाहिए

अगर अपनी जेबों को पैसो से भरना ग़लत हैं

तो किसी एक इंसान को देवता जैसा पूजना सहीं हैं क्य़ा

अगर सियासत के नाम पर ज़ंग करवाना सहीं हैं

...

तो देश बेचने वालों को ग़लत कहना ग़लत क्यूँ

और अगर धर्म के नाम पर बटवाना करना सही हैं

तो आजादी के नाम पर नारे लगना ग़लत क्यूँ

किसी एक इंसान से दिल खोलकर प्यार करना सही हैं

फ़िर वो जब किसी से करता हैं

तो फ़िर मुझे क्यु सही नहीं लगता

और वो सही हैं तो मैं ग़लत क्यूँ

यह सही और ग़लत के बीच मे कुछ होता भी हैं क्या

...

जब रात की लोकल धीमें कदमों से 

अँधेरी स्टेशनो पर आती हैं

तो सारी औरते उस पर लपक जाती हैं

एक ही डब्बा नसीब होता हैं औरतो को 12 बजे के बाद

उस एक डब्बे मे सारी औरते चड़ जातीं हैं

...

मेने पूछा है कई दफे ट्विटर official से

आपको क्या लगता हैं

औरते 11 बजे के बाद घर से नहीं निकलती क्या

इसलिए लाद देते हैं उन्हें बोरियों के तरह 

एक दूसरे को ऊपर या आप सोचते हो कि 

औरतो को घर के बाहर निकलना ही नहीं चाहिए

...

ज़वाब के नाम पर आई कुछ भारी भरकम  

misogyny और एक लंबी सी चुप्पी

उस चुप्पी का शोर आजतक गूँजता हैं 

संडे कीं दोपहर वाली डब्बे में

अगर औरतों की हिफ़ाज़त करना बुरी नहीं हैं 

तो औरत का आवाज उठाना ग़लत है क्या

...

अगर निर्भय होकर मरना ग़लत है 

तो घुट घुट कर जीना सही होगा क्या

फ़िर रात की लोकल ट्रेन हैं 

तो अपने साथ ढेर सारा समय लाती हैं

तो एक हाथ यहाँ और एक टांग वहाँ टिकाकर 

सपने देखने का वक़्त मिल ही जाता है

...

क्या हैं न सपनों के तो पर होते हैं

आप चाहें खुद को कितना जकर ले सपने तो आजाद हैं

होठों पर उसके होंठ का सपना देखना ग़लत हैं क्य़ा

बीच रात उसकी छुअन कीं बहीमा करना सही क्यूँ नहीं

अगर किसी इंसान से तमाम उम्र प्यार करना सही हैं

तो अमृता का प्यार साहिल के लिए ग़लत था

और अगर एक इंसान की आरजू में तड़पना ग़लत हैं

...

तो इमरोज़ का प्यार अमृता के लिए गलत था क्या

अगर ख़ुद गर्जी प्यार को ख़तम करती हैं तो 

उसे पैदा कौन करता है

अगर ये दुनिया दुनिया वालों के हिसाब से चलतीं हैं 

तो हर रोज एक मजनू क्यूँ मरता हैं

अगर इश्क़ इबादत हैं तो धर्म के नाम पर क्यूँ बटता है

अगर सूकून ही चाहिये तो उससे मिलने को 

दिल बार बार क्यूँ करता हैं

यह ग़लत और सही सही और ग़लत का फ़ैसला कौन सकता हैं





... Thank You ...




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